Sunday, April 15, 2018

उम्मीद थी गुलबों की,वास्ता पड़ा है काँटों से...




उम्मीद थी गुलबों की,वास्ता पड़ा है काँटों से,

उम्मीद थी उजलों की,वास्ता पड़ा है रातों से I


अजीब  सा है रास्ते का मंज़र,

डर लगता है,

कहीं खून बिखरा है कहीं खंज़र I


पहले आँखों में काजल था,

आज फकत सियाही है,

पहले सिने में सोना था,

आज गूंगी गवाही हैI


किस्मत का बदलना,

एक सच्चाई है,

वैसे ही जैसे ,

पानी पे लिखी, लिखाई है I

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