सहसा उसकी खुशबु आई,
लगा जैसे वो रु ब रु आई,
उदास तो था कमरा ,
पर लगा जैसे वो मुस्काई ,
क्या हीं वो मंज़र होता ,
रात चाँद, वो, मैं और तन्हाई!
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