Sunday, October 21, 2018

ज़िंदगी हर रोज़ एक पहेली है...



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ज़िंदगी हर रोज़ एक पहेली है,
ज़िंदगी उलझे धागों की हथेली है I

ज़िंदगी फौलाद की मानिंद एक सिल्ली है,
ज़िंदगी काँच की मानिंद एक झिल्ली है I

ज़िंदगी आँख से फूटती मोती गीली है,
ज़िंदगी गले से फूटती लोरी सुरीली है I

ज़िंदगी हर पल छूटती पतंग ढीली है,
ज़िंदगी हर पल टूटती नब्ज़ अकेली है I

ज़िंदगी ताश के पत्तों की हवेली है,
ज़िंदगी काश के गत्तों की सहेली है I

ज़िंदगी हर रोज़ एक पहेली है,
ज़िंदगी उलझे धागों की हथेली है I

 ब्लॉगर साथी सचिन बइकर कृत एक छंद जो इस कविता को मानव संघर्षों(खासकर मुंबईकरों के संघर्षों ) से जोड़ती है और एक नया अर्थ देती है, निचे इस छंद का आनंद लें :

ज़िंदगी हर रोज़ ट्रेन की सवारी है,
ज़िंदगी शाम को घर आने की तैयारी है I

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13 comments:

  1. very nice...very beautifully written

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  2. बहुत सुंदर रचना।

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  3. धन्यवाद ज्योति जी!

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  4. बहुत अच्छी तरह लिखित कविता 👍 नीरज। मुंबईकर के लिए दो लाइनें जोड़ना... आप से प्रेरित... 🙂

    ज़िंदगी हर रोज़ ट्रेन की सवारी है
    ज़िंदगी श्याम को घर आने की तैयारी है

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  5. सचिन आपके छंद को मैंने इस कविता में जोड़ दिया हैI
    कविता की सराहना के लिए बहुत धन्यावाद !

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  6. नीरज बहुत बहुत धन्यवाद :)

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  7. नीरज बहुत बहुत धन्यवाद :)

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  8. आपका स्वागत है सचिन!

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  9. नीरज अच्छी तरह से लिखी कविता
    मुझे कविता बहुत बहुत पसंद आयी

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    1. बहुत बहुत आभार वर्षा!

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  10. ज़िंदगी हर रोज़ एक पहेली है,
    ज़िंदगी उलझे धागों की हथेली है I

    ज़िंदगी फौलाद की मानिंद एक सिल्ली है,
    ज़िंदगी काँच की मानिंद एक झिल्ली है I

    beautiful lines. Today had some disturbance and this poem suits well today. Loved the addition for mumbaikar hahhah

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  11. Thanks Bhawana for visiting the post. The mumbaikar addition is creative input of Sachin as you already know, so he deserves the credit for those lines:-)

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