सहसा उसकी खुशबु आई,
लगा जैसे वो रु ब रु आई,
उदास तो था कमरा ,
पर लगा जैसे वो मुस्काई ,
क्या हीं वो मंज़र होता ,
रात चाँद, वो, मैं और तन्हाई!
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सहसा उसकी खुशबु आई,
लगा जैसे वो रु ब रु आई,
उदास तो था कमरा ,
पर लगा जैसे वो मुस्काई ,
क्या हीं वो मंज़र होता ,
रात चाँद, वो, मैं और तन्हाई!
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एक नई शुरुआत लिखनी है,
फूलों भरी बरसात लिखनी है ,
तारों भरी हर रात लिखनी है ,
भविष्य की बारात लिखनी है ,
अपनी एक नई औक़ात लिखनी है I
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कौन
जानता है की
किसी
को कौन से पाश
ने बांधा है ?
कौन
जानता है की
आंखें
क्यों गीली हैं, गाला
क्यों रुँधा है ?
कौन
जानता है की
मन क्यों भारी है,
उर क्यों बिंधा है ?
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न कोई बीज फलता है,
न वो अज़ीज़ मिलता है I
न कोई गम पिघलता है,
न मेरा दम निकलता है I
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कौन कह सकता है...
की यही सही रास्ता है ?
कौन कह सकता है की ...
वो सपना आँखों में
दिन रात क्यों बसता है ?
कौन कह सकता है की ...
हालत क्यों खस्ता है ...
जीवन क्यों सस्ता है ?
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वो मौन रहता है,
वो खोजता है,
उसके भीतर कौन रहता है I
वो आंखें मूंदे रहता है,
फिर भी वो देखता है ,
जीवन को क्या बींधे रहता है I
वो मनस्वी, वो तपस्वी,
कभी वन में ,
कभी हिमालय की शरण में,
परखता रहता है की,
मुक्ति को क्या बांधे रखता है I
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बोलते रंग,
फूलों से खेलते रंग,
पत्तों में डोलते रंग I
इंद्रधनुष में लिपटे रंग,
सूर्यकिरण में सिमटे रंग I
अम्बर में बिखरे रंग,
समंदर में पसरे रंग I
जीवन में ढलते रंग,
जीवन को ढालते रंग I
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जो बस में होता मेरे,
मैं लिख देता तुम्हारे...
आसमान में सिर्फ सवेरे I
जो बस में होता मेरे ,
मैं लिख देता तुम्हारी...
किस्मत में रौशनी के फेरे I
जो बस में होता मेरे,
तो गूंथ देता तुम्हारे बालों में ...
सूरज की किरणों के डेरे I
जो बस में होता मेरे,
तो बुन देता तुम्हारी...
ओढ़नी में चाँद तारे सुनहरे I
पुनश्च : मेरी छोटी बहन गुड्डन के लिए
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समय की रूई का महल ,
मोम की मानिंद पिघल रहा है I
दिन रात में, रात दिन में,
जल्दी जल्दी बदल रहा है I
कितना कुछ करना बाक़ी है ,
गिनती शुरू हो गई है , बारी आने वाली है ,
मन डर रहा है, दिल दहल रहा है I
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एक जाल है,
इसमें उलझी ज़िन्दगी एक कमाल है I
एक दरिया है ,
आंखें दिल पोंछने का ज़रिया है I
एक रोग है ,
ज़िन्दगी मुसलसल एक योग है I
एक सूरज है,
ज़िन्दगी उगता डूबता धीरज है I
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लिखना है तो कलंदर से सीखो ,
जो रोज़ गहरे डूबता और निखरता है I
जीना है तो समंदर से सीखो ,
जो रोज़ आग उगलता और निगलता है I
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जीते तो हैं सब लोग,
पर ज़िन्दगी को दूर से तकते हैं कुछ लोग I
दौड़ते तो है सब लोग,
पर मंज़िल को दूर से तकते हैं कुछ लोग I
संवारते तो हैं सब लोग,
पर ज़िन्दगी को उजड़ते देखते हैं कुछ लोग I
कौन हैं ये कुछ लोग ?
आप नहीं जनाब ,
ये हम हैं, हम हीं हैं वो कुछ लोग I
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दरिया, समंदर एक तरफ ,
उसकी आँखों का मंतर एक तरफ I
शाख, शजर एक तरफ ,
उसकी जुल्फों का मंतर एक तरफ I
दुनिया, शहर एक तरफ ,
उसके होने का अंतर एक तरफ I
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चिट्ठी आती थी रोज़ ,
पर उसपे मेरा नाम नहीं था I
मिलता था वो मुझसे रोज़ ,
पर मेरे लिए कोई पैगाम नहीं था I
ख्वाब,सपने, सब थे दुनिया में ,
पर मेरे लिए उनका कोई काम नहीं था I
मैंने तो शुरू किया था मेरी तरफ से,
पर इस कोशिश का कोई अंजाम नहीं था I
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कंकर, पत्थर, सब कुछ,
आईने के दुश्मन सब कुछ I
दुविधा, भरम के नश्तर, सब कुछ,
माईने के दुश्मन सब कुछ I
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