Sunday, February 2, 2020

अंज़ाम सोच के कहाँ ...



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अंज़ाम सोच के कहाँ 
आगाज़ की जाती है ज़िंदगी I

टूट के, बिखर के हीं
कई बार... 
परवाज़ की जाती है ज़िंदगी I
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Friday, January 31, 2020

क्या पता था की...



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क्या पता था की...
ज़िंदगी किस्मत की परछाई है?

क्या पता था की...
ज़िंदगी दर्द की ऊँचाई है ?

क्या पता था की...
एक अबूझ सच्चाई है ?


क्या पता था की...
ज़िंदगी आगे कुआँ पीछे खाई है?

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Tuesday, January 28, 2020

इतना मत मुस्कुराओ यार...




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इतना मत मुस्कुराओ यार,
किसी के लबों ने सिर्फ़ आँसू ही पिए हैं I


अपनी किस्मत के आसमान  पे,
इतना मत इतराओ  यार,
किसी को  खूब मेहनत के बाद भी ,
बस ज़िंदा रहने के सामान हीं मिले हैं I
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Friday, January 24, 2020

तुझमें मुझमें ये अंतर था


तुझमें मुझमें ये अंतर था,
की तेरा 'मैं' मुझसे बेहतर था,
और मेरा 'भय' मुझमें निरंतर था I

काश की कोई जंतर होता,
'मैं' साधने का कोई मंतर होता,
तो आज मैं भी उफनता सागर होता,
तेरे जैसा मेरे पास भी पावर होता I
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Wednesday, January 22, 2020

The definition of real rational!





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Nowadays our land is reverberating with the shrill sounds of dissent against the Citizenship Amendment Act (CAA). People arguing against CAA consider it irrational. And the herd of innocuous intelligentsia is hell-bent on proving that the CAA is a lope-sided act forgetting conveniently that the audacious dismembering of a considerable chunk of Hindusthan in 1947 was not a balancing act either. I am yet to hear a clamour about that from these guys.

The definitive rational was only Mr.Jinnah who decided that Hindus and Muslims couldn’t live together, so as a rational step the land of Hindus should be torn apart to make a separate nation for Muslims. And thus the Hindus should be stripped off their holy places that could be converted into ruins as mark of victory over Hindus. Because, the unquenchable- rational -thirst could not be satisfied only with ‘Hindukush’. 

The sapient Jinnah wanted humongous humiliation of Hindus to sound rabid rational.

Pic Courtesy: Google Images


The irrational souls believe in “Vasudhaiva Kutumbakam”…the rational revolutionaries believe in “Kashir banawon Pakistan, Bataw varaie, Batneiw saan”(We will turn Kashmir into Pakistan alongwith Kashmiri Pandit women, but without their men folk). 

Slew of savant souls could not even bleat when scores of Hindu Pandits were made to vacate their homes in Kashmir. The rational resin rendered their lips powerless to utter even a letter against the pogrom and mass exodus, but today after the CAA, the lips have got a shot of rational vitamin and they are making all the ruckus possible against the CAA.

Pic Courtesy: Google Images


In order to prove themselves real rationals they forget the searing pain that has been suffered by their own people. Spare some vocal energy for those who for their no mistakes at all were declared ‘minorities’ and ‘fit for oppression’ in a land that was their own before predatory partition. Some time they should show solidarity for Kashmiri Pandits also, who were made to vacate their homes in a freezing January month, just imagine the brutal fate that they had to go through just because of their faith!

Just Imagine their haplessness and helplessness only because they were Hindus!

Get real... people, only then you can get real rational!


Sunday, December 29, 2019

पर ना जाने क्यूँ ?



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मैने सब कुछ 
सही किया
पर ना जाने क्यूँ 
सब ग़लत हो गया ?

मैने सपनों को
अमृत अमृत सींचा
पर ना जाने क्यूँ
सब मृत हो गया ?

मैने अरमानों को
परबत परबत पाला
पर ना जाने क्यूँ 
सब गर्त हो गया ?
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Tuesday, December 3, 2019

ये ज़िंदगी है...




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कभी आँखों से तूफान बन के
बरसती है,
कभी साँसों में आग बन के
पिघलती है,
कभी हृदय में दर्द का ज्वार बन के
उमड़ती है,

ये ज़िंदगी है...
सबसे एक बार ज़रूर मिलती है I
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Sunday, November 17, 2019

वो कुछ कह भी दे तो क्या...





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वो कुछ कह भी दे तो क्या,

वो कुछ शह भी दे तो क्या,


अब तो शाम हो गयी ज़िंदगी की,


वो अपने दिल में जगह भी दे तो क्या I
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Monday, November 4, 2019

ये नींव के पत्थर !


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चित्र साभार :https://littleindia.com/keralite-nris-turn-towards-posh-old-age-homes-parents/

सोचता हूँ अक्सर,

अंधेरे में रहना,


गुमनामी पिरोना,


अकेलापन सहेजना,


हर कम्पन सहना,


फिर भी कुछ ना कहना,


रहते हमेशा दबकर,


सहते सबकुछ हंस कर,


सोचता हूँ अक्सर,


के किस मिट्टी के होते हैं,


ये नींव के पत्थर !


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Friday, October 18, 2019

उम्मीद के पंखों पे सपनों का भार...




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उम्मीद के पंखों पे,
सपनों का भार I

वो लुढ़कती किस्मत,
वो मिलती हार I

वो रंगों की रौनक,
वो रौशनी की फुहार,
बस मुझको हीं क्यूँ,
करवाते हैं इतना इंतेज़ार?

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Tuesday, October 8, 2019

तेरे दम से जीवन की अभिव्यंजना...





चित्र शीर्षक : देवी दुर्गा, शक्ति की अभिव्यक्ति
चित्र साभार : श्रीमती सुचेता प्रियाबादिनी का फेसबुक पन्ना
चित्र अधिकार : सुचेता प्रियाबादिनी



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तू पाखंड कुचे
तू उद्दंड भच्छे
तू ब्रह्मांड
का आनंद रचे


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तू उत्सव क्रीड़ा,

तू प्रसव पीड़ा,

वो हरदम हारा,

जो तुझसे है भिड़ा I


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तू आरंभ की मौलिक गर्जना,

तू प्रारंभ की मौलिक सर्जना,

तू जीवन का हँसना रोना,

तेरे दम से जीवन की अभिव्यंजना I


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पश्चलिपि: यह रचना श्रीमती सुचेता प्रियाबादिनी की चित्र कृति  "देवी दुर्गा, शक्ति की अभिव्यक्ति" से प्रेरित है I मैने जिस विश्वविद्यालय से स्नातकोतर( प्रबंधन) की पढ़ाई की है, श्रीमती सुचेता प्रियाबादिनी वहाँ निदेशक पद पे कार्यरत है I इस तरह से मेरा रिश्ता उनसे गुरु शिष्य का है और इसी रिश्ते के आधार पर मैं उनकी चित्राकृतियों को शब्दों में आकर देने का साहस कर पाता हूँ I चित्राकृति को शाब्दिक स्वरूप देते समय मेरा प्रयास चित्रकार के कलात्मक मन को पढ़ने का होता है, लेकिन मैं अपने प्रयास में कितना सफल हो पता हूँ,ये तो पाठकों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है I


Friday, October 4, 2019

दो क़दमों से भागते सपने...



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दो क़दमों से भागते सपने,
छूना चाहते हैं आकाश,
होना चाहते हैं पंख I

दो तालों में उलझी धड़कनें ,
बुनना चाहती हैं प्रबल प्रयास ,
फूंकना चाहती हैं विजय शंख I


दो आँखों में चंदा तारे,
मंज़िल को  दे रहे पुकारे ,
बहुत देर तक राह तकी,
अब सोते हैं हम,
थके हारे ...
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Monday, September 30, 2019

सुनो एक कहानी सुनाते हैं...



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सुनो एक कहानी सुनाते हैं,
कुछ आँखों का पानी सुनाते
हैं,
कुछ दुनिया ये फानी सुनाते
हैं I

कुछ आदम हौआ की जवानी
सुनाते हैं,
कुछ उनके औलादों की बिखरी ज़िंदगानी
सुनाते हैं I

कुछ युद्ध की वीरानी सुनाते हैं ,
कुछ बुद्ध की ज़ुबानी सुनाते हैं I

कुछ राधा रूमानी सुनाते हैं,
कुछ मीरा दीवानी सुनाते हैं I

कुछ बीती डगर सुहानी सुनाते हैं,
कुछ आती सहर रूहानी सुनाते हैं,
सुनो एक कहानी सुनाते हैं...
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