न कोई बीज फलता है,
न वो अज़ीज़ मिलता है I
न कोई गम पिघलता है,
न मेरा दम निकलता है I
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न कोई बीज फलता है,
न वो अज़ीज़ मिलता है I
न कोई गम पिघलता है,
न मेरा दम निकलता है I
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कौन कह सकता है...
की यही सही रास्ता है ?
कौन कह सकता है की ...
वो सपना आँखों में
दिन रात क्यों बसता है ?
कौन कह सकता है की ...
हालत क्यों खस्ता है ...
जीवन क्यों सस्ता है ?
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वो मौन रहता है,
वो खोजता है,
उसके भीतर कौन रहता है I
वो आंखें मूंदे रहता है,
फिर भी वो देखता है ,
जीवन को क्या बींधे रहता है I
वो मनस्वी, वो तपस्वी,
कभी वन में ,
कभी हिमालय की शरण में,
परखता रहता है की,
मुक्ति को क्या बांधे रखता है I
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बोलते रंग,
फूलों से खेलते रंग,
पत्तों में डोलते रंग I
इंद्रधनुष में लिपटे रंग,
सूर्यकिरण में सिमटे रंग I
अम्बर में बिखरे रंग,
समंदर में पसरे रंग I
जीवन में ढलते रंग,
जीवन को ढालते रंग I
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जो बस में होता मेरे,
मैं लिख देता तुम्हारे...
आसमान में सिर्फ सवेरे I
जो बस में होता मेरे ,
मैं लिख देता तुम्हारी...
किस्मत में रौशनी के फेरे I
जो बस में होता मेरे,
तो गूंथ देता तुम्हारे बालों में ...
सूरज की किरणों के डेरे I
जो बस में होता मेरे,
तो बुन देता तुम्हारी...
ओढ़नी में चाँद तारे सुनहरे I
पुनश्च : मेरी छोटी बहन गुड्डन के लिए
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समय की रूई का महल ,
मोम की मानिंद पिघल रहा है I
दिन रात में, रात दिन में,
जल्दी जल्दी बदल रहा है I
कितना कुछ करना बाक़ी है ,
गिनती शुरू हो गई है , बारी आने वाली है ,
मन डर रहा है, दिल दहल रहा है I
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एक जाल है,
इसमें उलझी ज़िन्दगी एक कमाल है I
एक दरिया है ,
आंखें दिल पोंछने का ज़रिया है I
एक रोग है ,
ज़िन्दगी मुसलसल एक योग है I
एक सूरज है,
ज़िन्दगी उगता डूबता धीरज है I
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लिखना है तो कलंदर से सीखो ,
जो रोज़ गहरे डूबता और निखरता है I
जीना है तो समंदर से सीखो ,
जो रोज़ आग उगलता और निगलता है I
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जीते तो हैं सब लोग,
पर ज़िन्दगी को दूर से तकते हैं कुछ लोग I
दौड़ते तो है सब लोग,
पर मंज़िल को दूर से तकते हैं कुछ लोग I
संवारते तो हैं सब लोग,
पर ज़िन्दगी को उजड़ते देखते हैं कुछ लोग I
कौन हैं ये कुछ लोग ?
आप नहीं जनाब ,
ये हम हैं, हम हीं हैं वो कुछ लोग I
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दरिया, समंदर एक तरफ ,
उसकी आँखों का मंतर एक तरफ I
शाख, शजर एक तरफ ,
उसकी जुल्फों का मंतर एक तरफ I
दुनिया, शहर एक तरफ ,
उसके होने का अंतर एक तरफ I
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चिट्ठी आती थी रोज़ ,
पर उसपे मेरा नाम नहीं था I
मिलता था वो मुझसे रोज़ ,
पर मेरे लिए कोई पैगाम नहीं था I
ख्वाब,सपने, सब थे दुनिया में ,
पर मेरे लिए उनका कोई काम नहीं था I
मैंने तो शुरू किया था मेरी तरफ से,
पर इस कोशिश का कोई अंजाम नहीं था I
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कंकर, पत्थर, सब कुछ,
आईने के दुश्मन सब कुछ I
दुविधा, भरम के नश्तर, सब कुछ,
माईने के दुश्मन सब कुछ I
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क्यूँ कहें की हम हैं ?
हम होते तो क्या दिखाई न देते ?
क्यूँ कहें हम की सुनो हमें ?
हम होते तो क्या सुनाई न देते ?
जिस दिन हम हवा से बादल,
और बादल से बिजली बनेंगे ,
हम दिखाई भी देंगे ,
हम सुनाई भी देंगे I
तो तब तक बस इंतज़ार...
आवाज़ मेरी पत्थर बन गई,
दुआ में निकली तो ख़्वाब तोड़ गई I
आंसू मेरे कांटे बन गए,
गालों पे उगे और ,
ज़िन्दगी में सन्नाटे बन गए I
दिल की धड़कनों में अड़चनें बुन गईं ,
सांसों की थिरकनों में उलझनें चुन गयीं I
हम बोलें भी तो सुनाई नहीं देते हैं ,
हम डोलें भी तो दिखाई नहीं देते है I
हमारा होना हवा बन गया ,
औरों का होना, सोना बन गया ,
दुआ बन गया , दवा बन गया I
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सोचा था एक घर बना लूंगा ,
सोचा था एक असर बना लूंगा I
न घर बना ना असर बना ,
जीवन टूटा शहर बना I
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