Tuesday, February 21, 2023

सूरज ढल गया साहब...

सूरज ढल गया साहब 

ज़माना बदल गया साहब 


कभी उड़ते थे आसमानों में 

कभी हम भी थे पहचानों में 


पर सूरज ढल गया साहब 

ज़माना बदल गया साहब 


कभी तारों से करते थे बातें 

कभी आवारों सी कटती थी रातें 


पर सूरज ढल गया साहब 

ज़माना बदल गया साहब 


कभी दौड़ते थे सन सन

कभी ऐंठते थे तन तन 


पर सूरज ढल गया साहब 

ज़माना बदल गया साहब 


कभी हर कोई था हमसे छोटा 

कभी हर एक का सिक्का था खोटा


पर सूरज ढल गया साहब 

ज़माना बदल गया साहब 


शाम बेसब्र थी...


शाम बेसब्र थी,
रात  की ज़ुल्फ़ों में  खोने को,
तारों की झुरमुट में सोने को,
ख़्वाब की आहट संजोने को I 

मैं बेसब्र था,
उसकी सांसों में अपनी सांसें भिगोने को,
उसकी आँखों में अपनी आँखें डूबोने को 
उसकी लबों में अपने लब पिरोने को I 
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रफ़ता रफ़ता दिन ढले...

रफ़ता रफ़ता दिन ढले,

पुर्ज़ा पुर्ज़ा  साँसे I 


रफ़ता रफ़ता सपने मरे,

पुर्ज़ा पुर्ज़ा आसें I 

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