रेत का घर,
समंदर का डर I
कांच के सपने,
दुश्मन होते अपने I
ख्वाब का शहर,
खूंखार मंज़र I
गिनती करतीं सांसें ,
मिटटी में मिलती आसें I
आसमान से बिछड़ता तारा,
जीवन बनता अंगारा I
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